Political Nature of Education – शिक्षा की राजनैतिक प्रकृति

Political Nature of Education

Political Nature

शिक्षा की राजनैतिक प्रकृति (Political Nature) को समझने से पूर्व हमें राज्य की राजनैतिक प्रकृति के बारे में समझाना होगा। किसी भी संप्रभु राज्य की राजनैतिक प्रकृति का निर्माण उसकी संस्कृति, जनता के भाव, विचार और सहभागिता से होता है। भारतीय राजनैतिक संस्कृति में प्राचीन समय से ही नैतिकता, मानवता और कर्तव्य को प्राथमिकता दी गयी है। जिसमे सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय को प्राथमिकता दी गयी है।

“राजनैतिक प्रकृति का आशय राजनैतिक पद्धति के मूल्य, विश्वास, गतिविधियों, सिद्धांतों एवं सरंचनाओं से सम्बंधित दृष्टिकोण है।”

राजनैतिक प्रकृति में समय – समय पर परिवर्तन होते रहते है। राजनैतिक प्रकृति का सम्बन्ध राजनितिक पद्धति, नागरिक, समाज एवं उनकी भावनाओं एवं विचारों से है।  समाज के द्वारा समय – समय पर परिवर्तनों की मांग होती रहती है। वर्तमान समय में भारत की राजनैतिक प्रकृति में धर्म (सम्प्रदायवाद), जातिवाद एवं स्वार्थपरकता के दोष आ गए है।

Education Nature

सविधान निर्माताओं ने शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय का केन्द्रीयकरण नहीं किया है। इसके पीछे उनका उद्देश्य विविधता में एकता वाला देश रहा था। उनका मानना था कि यदि शिक्षा का केन्द्रीयकरण कर दिया गया तो विभिन्न संस्कृतियों से आने वाले बच्चों का सर्वांगीण विकास नहीं हो सकेगा। भारत में शिक्षा को राज्य सूचि में रखा गया है।

कोठारी आयोग के अनुसार भी शिक्षा को राज्य और केंद्र सरकारों के सामंजस्य से क्रियान्वित करने की सिफारिश की गयी थी। आयोग ने कहा कि भारत जैसे विशाल देश में सविधान द्वारा दी गयी व्यवस्था उचित है। शिक्षा को समवर्ती सूचि में रखने से केंद्र और राज्य अलग – अलग शिक्षा की प्रकृति तय करेंगे जिससे देश के विकास में बाधा उत्पन्न होगी। इससे गवेषणा अर्थात अन्वेषण की स्वतंत्रता भंग होगी।

भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर शिक्षा पर कार्य कर रही है। संविधान द्वारा ऐसे प्रावधान किये गए है जिनके माध्यम से केंद्र और राज्य अपने – अपने दायरे में रहकर शिक्षा के लिए कार्य कर सकते है। 

 

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