Lifelong Learning and Development – जीवन पर्यन्त शिक्षा और ECCE

जीवन पर्यन्त शिक्षा – Lifelong Learning

जीवन पर्यन्त शिक्षा एवं विकास (Lifelong Learning) में ECCE का महत्वपूर्ण योगदान है। ECCE की अवधि को मनोवैज्ञानिकों ने आगे की समस्त शिक्षा का आधार माना है। मानव के विकास की अलग – अलग अवस्थाएँ होती है। सभी अवस्थाएँ एक दूसरे से जुडी हुयी होती है। इसी निरन्तरता के कारण व्यक्ति का सम्पूर्ण विकास होता है। यदि किसी भी अवस्था में विकार उत्पन्न होता है तो व्यक्तित्व पर उसका गहरा असर होता है।

बालक एक सतत विकासवान, जिवंत और क्रियाशील प्राणी होता है। कहा जाता है कि “The child is the father of man”. गाँधी जी के अनुसार शिक्षा के माध्यम से बालक के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सर्वोत्तम गुणों बाहर लाना है। बालक को 3 से 6 वर्ष तक आयु में जो पारिवारिक, सामाजिक और शैक्षणिक वातावरण मिलता है, उसी के अनुरूप उसके व्यक्तित्व का विकास होता है।

सामाजिक विकास हेतु

जन्म से 6 वर्ष तक बालक में उत्तम गुणों के विकास के लिए ECCE आवश्यक है। देश की भावी पीढ़ी को सही दिशा देने हेतु ECCE की नितांत आवश्यकता है । यदि एक बालक के कोमल मन को ठीक तरह से पोषण दिया जाय तो भविष्य में वह एक आदर्श नागरिक बनता है। एक बेहतर समाज के निर्माण में बालक को बचपन से ही अच्छी सीखे दी जानी चाहिए।

आधुनिक समाज में आवश्यक – Lifelong Learning

आजकल के भागदौड़ भरे जीवन चक्र में माता-पिता बालक का ठीक से ध्यान नहीं रख पा रहे है। रोजी-रोटी के कारण गावों से शहरों में पलायन होता है। संयुक्त परिवारों का विघटन हो रहा है। माता-पिता दोनों ही धन कमाने में लगे हुए है। ऐसे में बच्चों का उचित ध्यान रखने वाले नहीं है। पहले संयुक्त परिवारों में घर के बड़े बच्चों को जीवन उपयोगी सीखे देते थे। ऐसी स्थिति में ECCE की अधिक आवश्यकता है।

घर की महिलायें भी जीविकोपार्जन के लिए बाहर जाने लगी है। छोटे बच्चो की देखभाल  बाल शालाएँ के माध्यम से की जाती है। इस कारण ECCE की परिकल्पना आधुनिक समाज का हिस्सा बन गयी है। 

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