Kishoravastha me Adjustment in Hindi – किशोरों की समायोजन की समस्या

Kishoro ki Samasya
Kishoravastha

किशोरों की समायोजन की समस्या – Kishoravastha

किशोरावस्था (Kishoravastha) जीवन का ऐसा मोड़ है जहाँ से बालक या बालिका में शारीरिक और मानसिक परिवर्तन होते  है। ऐसे समय पर बच्चों के व्यक्तित्व पर परिवार के वातावरण का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है।

ऐसे समय में माता – पिता और बच्चों के मध्य भावनात्मक जुड़ाव होना अत्यंत आवश्यक है। यह लगाव उनके शारीरिक और मानसिक विकास में सहयोग करता है। 

वर्तमान समय मोबाइल युग का है। बच्चे माता – पिता से अधिक मोबाइल के साथ समय व्यतीत करते है। बच्चे ही नहीं माता – पिता भी मोबाइल पर अत्यधिक समय व्यतीत करते है। आत्मिक लगाव की कमी के कारण परिवार में तनाव, चिंता, द्वेष, और कलेश का वातावरण बना रहता है।

ऐसे वातावरण के कारण परिवार के बच्चों पर नकारात्मक असर होता है। नकारात्मकता के कारण किशोरों में सामंजस्य की भावना का आभाव हो रहा है। 

Kishoravastha

एक शोध के अनुसार समायोजन (Adjustment) और सुरक्षा की भावना ऐसे किशोरों में अधिक होती है जिन्हे प्रेम, आत्मीयता और सकारात्मक वातावरण प्राप्त होता है।

इसके विपरीत कलहपूर्ण वातावरण एवं विसंगतियॉं वाले परिवारों के बच्चों में समायोजन की कमी होती है। पारिवारिक अस्वीकार्यता बालकों के मानसिक एवं शारीरिक विकास में बाधक है। 

शोध में पाया गया बच्चों का तिरस्कार और उपेक्षा से उनके स्वाभाव में आक्रामकता, असहायता  समाजविरोधी व्यवहार  जन्म  लेता है। पारिवारिक अस्वीकार्यता के कारण किशोरों में कुंठा, ईर्ष्या, निर्दयता, समायोजन का आभाव उत्पन्न होता है।

माता – पिता के द्वारा भाई – बहनों के मध्य तुलना, सबके सामने उनके विचारों का तिरस्कार, उनके लिए समय का आभाव, उनकी बात – बात पर हँसी उड़ाना और उन्हें अयोग्य समझना ही उनके स्वत्रंत अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगाना है। 

इन समस्याओं का हल पारिवारिक स्वीकार्यता है। माता – पिता का बच्चों के प्रति प्रेम, स्नेह, ही इसका एकमात्र निदान है। बच्चों की भावनाओं का सम्मान करना, उनके साथ बातचीत करना, खेलना, उनकी इच्छाओं में रूचि लेना, उन्हें घर की बातों की जानकारी देना, उनके दोस्तों को प्रोत्साहित करना।

स्वतंत्रता और अनुशाशन

सबसे महत्वपूर्ण उन्हें एक स्वतंत्र सत्ता के रूप में स्वीकार करना चाहिये।  बच्चों को अत्यधिक दबाव और नियंत्रण में नहीं  रखना चाहिये।  उन्हें सुखद, शांत और आनंदपूर्वक वातावरण में रहने देना चाहिए। 

समायोजन को विकसित करने के लिए माता – पिता को अनावश्यक अनुशासन के बजाय सतर्कता एवं सजगता से उनके क्रियाकलापों पर नियंत्रण रखना चाहिए। किशोरों को आवश्यकता पड़ने पर उचित मार्गदर्शन देना चाहिए।

किशोरावस्था में अति उत्साह होने के कारण वे मार्ग से भटक भी सकते है। किशोर अपने मित्रों से कुछ अहितकर बातें भी सिख सकता जो उसके लिए हानिकारक है। गलतियाँ होने पर उन्हें सकारात्मक रूप से समझाना चाहिए। 

किशोर (Kishoravastha) कल्पना लोक में विचरण करते है। इस उम्र वो खुली आँखों से सपने देखते है और उन्हें पूरा करने की इच्छा करते है। माता – पिता को उनकी रुचियाँ और इच्छाओं का सम्मान करना चाहिए। कई रुचियाँ उनके लिए हानिकारक भी हो सकती है ऐसे में अच्छी रुचियों के प्रति उन्हें  प्रोत्साहित करना चाहिए।

किशोरों की अपनी  एक मौलिकता और विशेषता होती है।  माता – पिता को चाहिये कि वे उनकी बातों को समझे और उनके विचारों का सम्मान करें। ऐसा करने से उनका वास्तविक स्वरूप निखरकर सबके सामने आ सकेगा। उन्हें अपने अनुसार चलने पर मजबूर नहीं करना चाहिये। 

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