Ekadashi Vrat Katha – इच्छित वर व सौन्दर्य प्रदाता कोकिला एकादशी व्रत

Kokila Ekadashi Vrat Katha
Ekadashi Vrat Katha

कोकिला व्रत का महत्व 

आषाढ़ माह की पूर्णिमा से कोकिला व्रत (Ekadashi Vrat Katha) मनाया जाता है। यह व्रत कुंवारी कन्याओं को मनोवांछित वर देने वाला है। विवाहित स्त्रियों इस व्रत को उनके पति के अच्छे स्वास्थ्य एवं आयु वृद्धि के लिए करती है। इस व्रत को दक्षिण भारत में अधिक किया जाता है।

व्रत की विधि 

इस व्रत में भगवान शिव एवं माता पार्वती की पूजा – अर्चना की जाती है। प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर दैनिक कार्यों से निवृत होकर यह पूजन विधिपूर्वक करना चाहिए।

पीपल या आँवले के पेड़ के निचे बैठकर भगवान शिव और पार्वती माता का पूजन बिलपत्र, धूप, दीप से करे। कुछ लोग चाँदी की या लाख की बनी हुयी कोयल की प्रतिमा का पूजन करते है। इस दिन निराहार व्रत रखना चाहिए एवं सूर्यास्त के पश्चात फलाहार ग्रहण करना चाहिए।

सौन्दर्य प्रदाता व्रत

कोकिला व्रत (Ekadashi Vrat Katha) आषाढ़ माह की पूर्णिमा से लेकर श्रावण मास की पूर्णिमा तक मनाया जाता है। इस व्रत को सौन्दर्य प्रदान करने वाला भी माना जाता है। इस व्रत के दौरान स्त्रियाँ अलग – अलग उबटन एवं जड़ी बूटियों से स्नान करती है। प्रत्येक दिन स्नान करने के पश्चात कोकिला का पूजन किया जाता है। व्रत की समाप्ति पर कोकिला की प्रतिमा ब्राह्मण को दान कर दी जाती है।

कोकिला व्रत कथा(Ekadashi Vrat Katha)  

प्रजापति दक्ष की पुत्री सती भगवान शिव से विवाह  करना चाहती थी। परन्तु राजा दक्ष को शिव भगवान को पसंद नहीं करते थे। राजा दक्ष के बहुत समझाने पर भी सती ने शिव से विवाह कर लिया था। इस बात को लेकर राजा दक्ष उनकी पुत्री सती से नाराज हो गये थे। एक बार राजा दक्ष ने शिव भगवान को अपमानित करने के लिए महायज्ञ का आयोजन किया।

यज्ञ में राजा दक्ष ने भगवान शिव को जानबूझकर आमंत्रित नहीं किया। देवी सती को ऐसा लगा कि उनके पिता शिव जी को आमंत्रित करना भूल गए है। देवी सती ने जब शिव जी से यज्ञ में शामिल होने की बात कही तो शिव जी ने वहाँ जाने से इनकार कर दिया।

शिव जी को पता था कि राजा दक्ष ने उन्हें अपमानित करने के लिए ही उन्हें आमंत्रण नहीं दिया है। परन्तु सती माता ने उनकी बात स्वीकार नहीं की ओर वे जिद करके पिता के यहाँ चली गई।

राजा दक्ष ने बिना निमंत्रण के यज्ञ में शामिल होने के लिए उन्हें अपमानित किया। राजा दक्ष ने माता सती के सामने उनके पति परमेश्वर भगवान शिव का भी घोर अपमान किया।

अपने पति का अपमान देवी सती सहन नहीं कर सकी। सती ने विचार किया कि पति की आज्ञा का उल्लंघन करने के कारण पुनः कैलाश पर्वत नहीं जा सकूँगी।

देवी सती का यज्ञ में भस्म होना 

देवी सती ने राजा दक्ष के यज्ञ कुंड में कूदकर स्वयं को भस्म कर लिया। जब यह बात भगवान शिव को पता चली तो अत्यंत दुखी हुए। भगवान शिव क्रोध में आकर राजा दक्ष का यज्ञ भंग करने के लिए वीरभद्र को भेजने का निर्णय लेते है। भगवान श्री विष्णु जी उन्हें समझाते है तो शांत होते है।

भगवान विष्णु उन्हें कहते है कि हे प्रभु यह सब आपके ही संकल्प से हुआ है। इस पर भगवान शिव 10,000 वर्षों के लिए घोर तपस्या में मग्न हो जाते है। माता सती कोकिला बनकर 10,000 वर्षों तक जंगलों में समय बिताती है।

10,000 वर्ष पूर्ण होने पर कोकिला बनी देवी सती पार्वती बनकर हिमालय राजा के यहाँ जन्म लेती है। पार्वती बचपन से ही शिव के प्रति अनुराग रखती है। युवावस्था आने पर वह भगवान शिव को पाने के लिए तपस्या करती है।

इच्छित वर प्रदाता व्रत

देवी पार्वती भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए आषाढ़ मास की एकादशी पर विधिपूर्वक शिव जी पूजन करती है। माता पार्वती का व्रत एवं तपस्या सफल होती है। भगवान शिव प्रसन्न होकर पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार करते है।  तब से ही आषाढ़ मास की एकादशी को कोकिला एकादशी (Ekadashi Vrat Katha) कहा जाता है। 

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बाह्य कड़ी –

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