Comfort Zone Meaning in Hindi – सुविधा क्षेत्र क्या है इससे कैसे बाहर निकले ?

Comfort zone
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सर्वसुविधायुक्त वातावरण – Comfort Zone Meaning

दोस्तों यदि जीवन स्वयं की पहचान बनानी हो तो हमें कम्फर्ट जोन (Comfort Zone Meaning) से बाहर निकलकर कार्य करना होता है। कम्फर्ट जोन अर्थात सर्वसुविधायुक्त वातावरण से बाहर निकलकर स्वयं के प्रयासों से अपनी पहचान बनाना होती है। हमें कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने में डर लगता है। 

किसी व्यक्ति को उसके परिवार के बड़ो की और से जो भी सुविधाएँ मिलती है उनका उपयोग करने में कोई बुराई नहीं है। व्यक्ति परिवार पर इतना निर्भर हो जाता है कि वह स्वयं को पहचानने का प्रयास ही नहीं करता है। यहाँ तक वह स्वयं अपनी पहचान भी भूल जाता है। व्यक्ति को ऐसा लगता है कि वह जो भी करता है पुरे परिवार के लिए ही करता है। 

सामूहिक रूप से कार्य करने में कोई बुराई नहीं है। जब तक स्वयं के बलबूते पर कुछ नहीं किया जाता तब तक किसी व्यक्ति की कोई पहचान नहीं होती है । घर के बड़ो को यदि यह विश्वास हो जाय कि मेरा बालक स्वयं के बलबूते पर दुनिया में सबकुछ पा सकता है। ऐसी स्थिति प्रत्येक माता-पिता, भाई-बहिन के लिए गर्व की बात होती है।

नए जीवन का आरम्भ 

भारतीय संस्कृति में विवाह के बाद एक नए जीवन का आरम्भ होता है। यही ऐसा समय होता है जब हमें कम्फर्ट जोन से बाहर निकल जाना चाहिए। यदि इस समय पर भी हम माता-पिता या भाई-बहिन पर निर्भर रहते है तो हमें सतर्क हो जाना चाहिए। किसी दिन माता-पिता या भाई-बहिन ने हमें यह कह दिया कि ‘कुछ तो करो’ तो स्वाभिमान को बहुत ठेस पहुँचती है। इसलिए स्वयं के सामर्थ्य अनुसार छोटा या बड़ा काम करना चाहिए ना की हमेशा कम्फर्ट जोन (Comfort Zone Meaning) में ही रहना चाहिए। 

दोस्तों जीवन में हमें इसी कम्फर्ट जोन को तोड़ने के लिए स्वयं को परेशानी में डालना पड़ता है। तैरने की किताबे पड़ने से या किनारे पर बैठकर तैराकों को देखते रहने से तैरने की कला नहीं सीखी जा सकती है। उसके लिए हिम्मत करके पानी में कूदना पड़ता है और अपना 100 प्रतिशत प्रयास करना होता है। जब पानी में डूबने की स्थिति आती है तो स्वयं को बचाने के लिए स्वतः ही हाथ-पाँव चलने लगते है और जान बच जाएगी । इसी प्रकार जब हम स्वयं को परेशानी में घिरा देखते है तो स्वयं के प्रयासों के माध्यम से अपनी पहचान बनाना शुरू कर देते है। और हमें सफलता मिलना शुरू हो जाती है। चाहे वह सफलता छोटी हो या बड़ी यो वह बहुत मायने रखती है। 

किसी महान व्यक्ति के द्वारा कहा गया है कि ‘दूसरों की बड़ी सफलता की परछाई बनने से स्वयं की छोटी सी सफलता कहीं अधिक बढ़कर है।’ 

पैसों का महत्व 

मैंने अपने पिछले लेख में प्रश्न उठाया था कि कर्तव्य महान है या पैसा ? मै अब भी कर्तव्य को महान समझता हूँ परन्तु आज के समय में महान कर्तव्य भी शून्य हो जाता है यदि उसके परिणाम में पैसा नहीं आता है तो। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि पैसा भगवान नहीं है, पर आज के समय में भगवान से कुछ कम भी नहीं है। अध्यात्म में जहाँ जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष है वहीं भौतिक संसार में जीवन का अंतिम लक्ष्य पैसा है। आज सभी के द्वारा यह माना जाने लगा है कि पैसों से ही सभी सुखो की प्राप्ति होती है। 

यहाँ मैं फिर एक सवाल उठाता हूँ कि यदि पैसों से ही सभी सुखों की प्राप्ति होती है तो उन पैसो वाले लोगो के जीवन में ऐसा क्या दुःख है जो आत्महत्या करते है। 

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